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शिक्षा अधिकार नहीं उपभोग की वस्तु कीमत तो चुकानी ही होगी   शिक्षा अधिकार नहीं उपभोग की वस्तु कीमत तो चुकानी ही होगी

शिक्षा अधिकार नहीं उपभोग की वस्तु कीमत तो चुकानी ही होगी शिक्षा अधिकार नहीं उपभोग की वस्तु कीमत तो चुकानी ही होगी

शिक्षा, चिकित्सा, बिजली और पानी इन्हें निजी हाथों में सौंपे जाने का असर अब समाज में स्पष्ट दिखने लगा है। हो भी क्यों न जब हम बाजार में उपभोक्तावादी मानसिकता के साथ खड़े हों खासकर तब। शिक्षा का अधिकार कानून बनाने वाले भला आप की इस मानसिकता का फायदा क्यों नहीं उठाएंगे। जबकि वे ये जानते हैं कि शिक्षा आप का अधिकार नहीं आपके उपभोग का संसाधन है। और संसाधन चाहिए तो जेब तो ढ़ीली करनी ही पड़ेगी। लेकिन कितनी.. इसका पैरामीटर क्या होगा.. तय कौन करेगा.. । ये सवाल है सभी के मन में.. तो जो अधिकार देगा वही यह भी तय कर देगा कि आपको शिक्षा कैसी चाहिए.. कहां चाहिए.. किन से चाहिए.. किनके साथ चाहिए.. इस आधार पर तय करेंगे की आपको जो शिक्षा चाहिए उसकी कीमत कितनी हो। तो आप के बजट में जो शिक्षा की दुकान फिट बैठे उसे चुन लीजिए। फिलहाल न्यूनतम दरों पर तो सरकारी शिक्षा ही उपलब्ध हो सकेगी। यह सरकार तय कर चुकी है। मैं कुछ नहीं कह रहा। आरटीई (शिक्षा का अधिकार) लागू होने के साथ ही सरकार ने यह भी तय कर दिया था कि आप अगर बच्चे को किसी नजदीकि निजी स्कूल यानि शिक्षा की किसी बेहतर दुकान पर अधिकार के साथ शिक्षा दिलवाना चाहते हैं तो उसकी कीमत सरकार को चुकानी होगी। क्योंकि आप उस श्रेणी में हैं जहां आपको ये अधिकार सरकार की ओर से मिला है। यदि आप इस श्रेणी में नहीं हैं तो आपको खुद यह कीमत चुकानी ही होगी।क्योंकि सरकार भी तो चुका ही रही है। ये और बात है कि 5का प्रवेश करवाकर 25 के पैसे उन बड़ी दुकान वालों ने सरकार से तब तक लिए जब तक कि सरकार का खजाना ही खाली नहीं हो गया। अब जरा सोचिए... क्या सरकार को लूटना इतना आसान है... या फिर सरकार खुद लुट रही थी.. मेरा काम तो सवाल खड़े करना है.. जवाब तो आप ही को मांगना और ढ़ूंढ़ना है। अब जरा यह भी समझिए.. शिक्षा की बड़ी दुकानें हर साल फीस में 10 से 30 फीसदी तक का इजाफा कर रहीं हैं। पूछने पर पता चला कि इसकी छूट शासन.. माफ कीजिए सरकार ने दे रखी है। कई शिक्षा अधिकारियों से बात की जवाब यही मिला। तो हर साल बच्चे की फीस पर कम से कम दस प्रतिशत खर्च बढ़ेगा ही यह तय है.. क्योंकि सरकार ने कहा है। तो आपको मानना ही चाहिए... हां ठीक कहा मानना ही पड़ेगा। नहीं मानोगे.. तो आइए शिक्षा की सरकारी दुकान पर। फिर एक सवाल खड़ा होता है कि जो सरकार शिक्षा शुल्क में10 फीसदी इजाफे का अधिकार हर साल शिक्षा की दुकान चलाने वालों को दे रही है वह यह तय क्यों नहीं कर पा रही कि शासकीय, निजी, अर्धशासकीय संस्थाओं में कार्य करने वाले कर्मचारियों के वेतन में भी कम से कम 10 फीसदी का इजाफा हर साल होना ही चाहिए। लेकिन यह होगा नहीं.. दरअसल मामला निजीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद से जुड़ा है। आप शिक्षा ले नहीं रहे आपको दी जा रही है .. आपकी पहुंच में हो तो ले लीजिए.. नहीं तो वही सरकारी दुकान शिक्षा वाली खुली है सबके लिए.. आप भी आ जाइए.. बिलकुल राशन की दुकान की तरह जो मिल रहा है उसी में खुश रहिए... गुणवत्ता की बात न पूछिए... शिक्षा की सरकारी दुकान पर व्यवस्था ठीक न लगे तो जिम्मेदारों के जवाब आपको नहीं जम रहा तो निजी स्कूल जाइए... और निजी स्कूलों में मंहगी शिक्षा की बात की तो सरकारी दुकान पर जाने का ताना.. जरा सोचिए... कि आम आदमी आखिरकार जाए तो जाए कहां... आप खास हों तो सोचने की जरूरत ही नहीं... सवाल आम आदमी के लिए ही है। आप जरा नेताजी.. मंत्री जी...साहब लोगों से पूछ ही लो आप मोहल्ले के सरकारी स्कूल में अपने बच्चे का एडमिशन करवाएंगे क्या... संभावित जवाब फलाने ने करवाया था... ढिकाना तो सरकारी स्कूल से ही पढ़कर निकला है... अरे उन्हें छोड़िए वो चुनावी साल था आप तो आज की बात कीजिए... Kumar Sanjay ke

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