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खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- परमात्मा के रहने मात्र से नहीं होगा उन्हें पहचानना होगा : स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- परमात्मा के रहने मात्र से नहीं होगा उन्हें पहचानना होगा : स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

श्रीउड़िया बाबा आश्रम स्थित श्री शंकराचार्य निवास में आयोजित सत्संग में द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के प्रवचन व आशीर्वचन हेतु वृंदावन के निवासियों के साथ साथ देश के कोने कोने से आये भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। शंकराचार्य जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज मंच संचालन करते हुए प्रथमः प्रत्येक विद्वत जन एवं भक्तों का स्वागत किया तथा मंगलाचरण हेतु बाल व्यास प्रशांत त्रिपाठी, योगेशनाथ त्रिपाठी, नमन तिवारी एवं सबसे छोटे उम्र के बटुक दुष्यंत पारासर को मंच में स्वागत किया। इन वेद के विद्यार्थियों के मंगलाचरण और कथा पश्चात स्वमश्री: ने ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज, ज्योतिष पीठ के व्यास जी एवं साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री व नील मणी शास्त्री को कथा का रस पान कराने हेतु आग्रह किया। इनके कथा के पश्चात पूज्य शंकराचार्य जी महाराज का पादुका पूजन ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज ने सम्पन्न करवाया तथा मंत्रोच्चारण ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद जी महाराज ने किया। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने उपस्थित भक्तों एवं श्रद्धालुओं से कहा कि परमात्मा के रहने मात्र से नहीं होगा उन्हें पहचानना होगा जिस हेतु राम नाम का जाप और ध्यान करना होगा। आगे उन्होंने कहा कि एक अखंड सच्चिदानन्द समस्त विश्व मे व्याप्त है तथा प्राणियों में उनका निवास है लेकिन उनको जानना कठिन है। पूज्य शंकराचार्य महाराज ने कहा कि परमात्मा की चार रूपों में अभिव्यक्ति होती है - नाम, रूप, लीला और धाम। यह माना जाता है कि यह चार होते हुए भी अभिन्न हैं। इनमें से किसी एक को कोई पकड़ ले तो परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। लोग नाम का ही स्मरण करते हैं क्यों कि वह प्रधान है। " वंदो नाम राम रघुवर को, हेतु कृसाणु भानु हिमकरको "। राम नाम कृसाणु , भानु, हिमकर का हेतु है। कृसाणु का अर्थ है अग्नि, भानु का अर्थ है सूर्य और हिमकर का अर्थ है चंद्रमा। इन्हें बीजाक्षर कहा जाता है। इन्ही बीज अक्षर में बिंदु लग जाने से यह बीजाक्षर हो जाते हैं।  आज के सत्संग में स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती, स्वामी गोविंदानन्द सरस्वती, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी धरानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी सुप्रियानन्द जी महाराज, कथा वाचक किशोर व्यास जी महाराज, ब्रह्मचारी रामानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी शारदानन्द जी महाराज एवं अन्य संत, महात्मा व भक्तगण उपस्थित थे।

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