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बोध घाट सिंचाई परियोजना : आदिवासियों में आक्रोश, इसके खिलाफ कर सकते हैं आंदोलन

बोध घाट सिंचाई परियोजना : आदिवासियों में आक्रोश, इसके खिलाफ कर सकते हैं आंदोलन

रायपुर :  छत्तीसगढ़ का बहुउद्देशीय बोध घाट सिंचाई परियोजना के काम को आगे बढ़ने से पहले ही ब्रेक लगता दिखाई दे रहा है। तकरीबन 22 हजार करोड़ की लागत वाली इस बहुचर्चित परियोजना से प्रदेश में सिंचाई और बिजली व्यवस्था को सुदृढ़ किये जाने की योजना है। लेकिन इस विकास में एक वर्ग विशेष को अनदेखा किये जाने की बात सामने आ रही है। ये वो वर्ग है जिसने पेड़-पौधों-नदियों को परिवार का सदस्य माना और पर्यावरण को धरोहर की तरह संजोकर रखा। ये वर्ग हैं आदिवासी, जिनपर विस्थापन का खतरा मंडराने लगा है।

इंद्रावती नदी पर बनने वाली इस परियोजना को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रमुख और शांतिदूत डॉ. उदयभान सिंह चौहान​ ने जमीनी हकीकत जानने के लिए इस परियोजना से प्रभवित होने वाले बस्तर संभाग के सुदूर गांवों जंगलों में रह रहे आदिवासियों से बात की। उन्होनें इस सम्बन्ध में इससे होने वाले फायदे-नुकसान का अध्ययन किया। अपने दौरे को लेकर डॉ उदयभान ने BBN24 NEWS.com से कैलाश जयसवाल के प्रश्नो का खुलकर जवाब दिया। प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ अंशः-

BBN24 : डॉ साहब बोधघाट परियोजना कि जमीनी हकीकत क्या है?

डॉ. उदयभानः मैंने जब बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष व विधायक लाखेश्वर बघेल, सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम, बस्तर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष व बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी और सर्व आदिवासी समाज के अन्य सदस्यों से इस सम्बन्ध में बात की। उनका जवाब यही मिला कि जब तक व्यवस्थापन की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी तब तक बोध घाट परियोजना का सुचारु होना संभव नहीं है। दूसरी बात ये निकल कर आई कि इस परियोजना से जो गांव प्रभावित होगा उन ग्रामवासियों कि राय लेना आवश्यक है। जब तक प्रभावित होने वाले ग्रामवासी नहीं चाहेंगे तब तक ये आसान नहीं होगा।

BBN24 : इस परियोजना के सम्बन्ध में प्रभावित होने वाले स्थानीय लोगों और सरकार के बीच कोई बात हुई?
डॉ. उदयभानः जब मेरी बात मनीष कुंजाम (Ex MLA, CPI) से हुई तो उन्होंने कहा कि 1987-89 में इस परियोजना को लेकर आंदोलन हुआ था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा की सरकार के समय ये परियोजना रिजेक्ट हुई थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि अनुसूचित जाति और जनजाति की बैठक की जानकारी के बगैर इस परियोजना को पुनः आरम्भ करने की अनुमति दे दी गयी? आदिवासियों को इस प्रश्न का जवाब न मिलने के कारण उनमे आक्रोश है। ये स्थानीय आदिवासी अपना जल, जंगल, जमीन आसानी से नहीं छोड़ेंगे।

 

BBN24 : क्या प्रभावित लोगों ने बोध घाट परियोजना के सम्बन्ध में अपनी शिकायत प्रशासन को बताई? 
डॉ. उदयभानः इस परियोजना को लेकर जब प्रभावित होने वाले ग्रामवासियों को इस परियोजना की पुनः आरम्भ होने की जानकारी मिली तो उन्होंने बीजापुर के कलेक्टर को इस सम्बन्ध में एक ज्ञापन सौंपा। उसके बाद कलेक्टर ने उन आदिवासियों को ‘ऐसा कुछ नहीं है’ कहकर गुमराह किया और वापस भेज दिया। 

BBN24 : जिलाधिकारी के इस रवैये पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही?
डॉ. उदयभानः जिलाधिकारी द्वारा टालमटोल करने के बाद, आदिवासियों ने इस सम्बन्ध में बेल्लूर में एक बैठक की, जिसमे स्थानीय प्रशासन द्वारा कोरोना काल में सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर बैठक जारी रखने को मना कर दिया। जिसके बाद, स्थानीय समाचार पत्र ने इस परियोजना के सम्बन्ध में आदिवासियों की सहमति की खबर लगाकर छापी गई। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था, सच्चाई ये है की इस सम्बन्ध में न तो प्रभावित होने वाले आदिवासी समाज से बात हुई, न ही इस परियोजना को लेकर पूर्व के आंदोलनकारियों से बात हुई। 

BBN24 : परियोजना वाली भूमि किसकी है, अब इसको लेकर लोगों की आगे की योजना क्या होगी?

डॉ. उदयभानः मुख्य बात ये है कि यहां कोई राजस्व भूमि नहीं है। यहां सारी भूमि वन विभाग की है। इस तरह राजस्व के चक्कर में पूरा वन सम्पदा नष्ट होगी। दूसरी तरफ जंगली इलाका होने के कारण कोई बंदोबस्त भी नहीं है। तीसरी बात ये है कि बस्तर में प्रचूर मात्रा में खनिज है, जिसके खनन के लिए पानी की जरुरत होगी। अगर ऐसे में पानी का इस्तेमाल कहीं और होता है, तो खनन का काम अवरुद्ध होगा। आदिवासी इस परियोजना को लेकर सहमत नहीं है, वो कभी भी इस परियोजना को लेकर आंदोलन शुरू कर सकते हैं।  

सरकार की इसी लचर व्यवस्था के कारण बहुउद्देशीय बोध घाट सिंचाई परियोजना पिछले 40 सालों से लंबित है। वर्ष 1992-93 में इस परियोजना के खिलाफ एक बड़ा जनांदोलन यहां के स्थानीय आदिवासियों द्वारा किया गया। उस समय की तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारों ने इस परियोजना पर आगे काम करने पर रोक लगा दी थी। इस परियोजना को लेकर अभी तक सरकार और आदिवासी समाज के बीच सामंजस्य ना बन पाना चिंता का विषय है। सरकार अगर स्थानीय आदिवासियों को गंभीरता से लेती, उनकी समस्याओं पर गौर करती, तो यहां का परिदृश कुछ और ही होता।

 

 

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