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 यक्ष प्रश्नों के साथ गोधन न्याय योजना उम्मीद की नई किरण

यक्ष प्रश्नों के साथ गोधन न्याय योजना उम्मीद की नई किरण

रायपुर जिस समय पूरा विश्व कोरोना महामारी और उससे उपजे आर्थिक संकट से जूझ रहा है तब छत्तीसगढ़ सभी मोर्चों पर विशेषकर आर्थिक मोर्चे पर विन विन सिचुएशन में है। यहां यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यह सब कैसे संभव हुआ? इसका एक सामान्य सा जवाब है प्रदेश की कमान ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जिसकी पृष्ठभूमि कृषि कर्म और छत्तीसगढ़िया संस्कारों से पगी हुई है। प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल ने कई मोर्चों पर अपनी सोच को अपनी ज़मीन पर उतारने के लिए सत्ता को माध्यम बनाया है। प्रदेश, किसानों और छत्तीसगढ़ के संस्कारों को आगे बढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता है। इसी प्राथमिकता के कारण वे खेती-किसानी और यहां के संस्कारों को आर्थिक दिशा में मोड़ते दिखाई देते हैं। संपूर्ण भारतीय व्यवस्था में कृषि सर्वोच्च है। ग्रामीण व्यवस्था में कृषि, पशुधन और उनसे मनुष्य को प्राप्य भारत के संस्कारों का निर्माण करते हैं। जिसने पशु और पशुधन संस्कारों को समझ लिया, उसके लिए समृद्धि और वैभव सुलभ हो जाएगा।

सर्वविदित है कि कोरोना लॉकडाउन की प्रारंभिक स्थिति में सरकारी प्रयासों के कारण काफी कुछ नियंत्रण में रहा। लॉकडाउन खुल जाने के बाद से छत्तीसगढ़ में भी कोविद महामारी की स्थिति बिगड़ी है लेकिन आर्थिक मोर्चे पर प्रदेश सम गति से आगे बढ़ता रहा है। ग्रामीण व्यवस्था से जुड़े पशुधन और किसानी को समृद्ध बनाने के लिए प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल की नवीनतम योजना है गोधन न्याय योजना जिसमें सरकार ने प्रदेश में गोबर खरीदी का निर्णय लिया है। यह उत्कृष्ट पहल की सफलता इस बात में है कि जब इससे जैविक खाद का निर्माण पूरी गति पकड लेगा और गोबर के कंडे और लकड़ी का प्रयोग आम होगा। यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं कि पशुपालकों और किसानी के काम से जुड़े लोगों के लिए एक सहायक आर्थिक उपार्जन का बड़ा स्रोत बन सकता है। यहां यब बात गौरतलब है कि मुख्यमंत्री बघेल ने गोधन न्याय योजना की घोषणा तो कर दी है लेकिन अभी गोबर क्रय की कीमतें क्या होंगी इसका निर्णय होना शेष है।

स्वाभाविक है शिक्षा के विस्तार के कारण पहले ही युवा शक्ति कृषि कर्म की बजाय नौकरी को दे रहे हैं। रोजगार और आय की फिक्र में गांवों से शहरों की ओर पलायन यक्ष प्रश्न है। ग्रामीण क्षेत्रों में चारागानों की कमी है, ऐसे में गोधन न्याय योजना का क्रियान्वयन गौठानों पर निर्भर रह जाएगा। गोबर संग्रहण के लिए क्या सरकार तकनीकी तौर तरीकों के विकास का काम करेगी या फिर ग्रामीण ही गोबर संग्रहण करेंगे? यदि ऐसा नहीं है तो गोबर संग्रहण का काम किस तरह से होगा। प्रशासनिक मशीनरी को ऐसे ही सवालों से जूझना होगा।

अब इसके आर्थिक पक्ष पर जाएं तो गोबर क्रय की कीमतें क्या होंगी? कीमत तय करने के लिए किन बातों को प्राथमिकता दी जाएगी और सबसे बड़ी बात इससे तैयार होने वाले उत्पाद, जैसे जैविक खाद, गोबर के कंडे तथा दाह संस्कार के लिए तैयार की जाने वाली लकड़ी उनके बिक्री के लिए कैसा नेटवर्क होगा और उनकी कीमतें क्या होगी? महासमुंद से गोबर की खाद निर्माण से जुड़े एक शख्स ने इस व्यवस्था पर जो अनुमान प्रस्तुत किए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं।

इन आंकड़ों के अनुसार प्रदेश भर से संकलित गोबर की खरीदी दर सरकार मात्र 1 रुपए तय करती है तो प्रदेश में सरकार को लगभग 22 अरब रुपयों की आवश्यकता होगी। गोबर से निर्मित उत्पादों की दर यदि 5 रु. निर्धारित की जाती है तो लगभग 110 अरब रुपयों की आय होगी। इस तरह गोधन न्याय योजना ग्रामीण व्यवस्था तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहायक होगा इसमें संदेह नहीं। ग्राम सुराज के लिए एक नई उम्मीद तो बनती ही है, साथ ही यह प्रदेश में पलायन रोकने में योजना भी सहयोगी साबित होगी। योजना किसानों तथा ग्रामीण जनों में उम्मीद की एक नई किरण तो है ही।

अंततः सवाल वहीं पर आ कर रुक जाता है कि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन का अब तक का जो दृश्य है उसमें यह कहना जल्दबाजी ही होगी कि योजना को जमीन पर साकार होने में कितना वक्त लग जाएगा।

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